क्या देश के किसानों ने अपने रावण की शिनाख्त कर ली है

सत्यम श्रीवास्तव

रावण एक मिथकीय पात्र है। जिसे एक प्रवृत्ति के तौर पर देखा जाता रहा है। दशहरे के रोज़ इस मिथकीय पात्र का दहन किया जाता है जिसे असल में खराब प्रवृत्तियों के नाश के रूप में समाज द्वारा ग्रहण किया जाता है। दिलचस्प ये है कि समाज में मौजूद खराब प्रवृत्तियाँ हर साल पैदा हो जाती हैं और हर साल उनका नाश होता है। रावण का इस तरह हर साल नाश किया जाना अधर्म और असत्य की निरंतर मौजूदगी का एहसास हमें कराता रहता है। इसे हिन्दी की ‘दूसरी परंपरा की नींव रखने वाले हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध निबंध ‘नाखून क्यों बढ़ते से हैं’ के संदर्भ में देखना चाहिए जहां वह कहते हैं कि ‘बढ़ते हुए नाखून हमारे पशु होने की निशानी हैं और यह हमें याद दिलाते हैं कि हमारे अंदर पशु प्रवृत्ति अभी भी मौजूद है’। इस तरह हम देखें तो हम सब में रावण मौजूद है। और हर वक़्त होता है। जिस तरह हम अपने नाखून काटकर इंसान बनने का प्रयत्न करते हैं उसी तरह हर साल दशहरे पर रावण को जलाकर भी बुराइयों से निजात पाने का उद्यम करते हैं।

सालों से रावण का पुतला जलाया जाना एक धार्मिक और सांस्कृतिक रिवाज की तरह अपना लिया गया है। रावण का पुतला जलाने वाले को राम के तुल्य मान लिया जाता है। राम जो रावण रूपी प्रवृत्ति के नाश का माध्यम बने। राम, जिन्होंने रावण का नाश करके धरती से अधर्म का नाश किया और धर्म की स्थापना की। राम, जिसने धर्म के मूल में न्याय और समता की स्थापना की। हिंदुस्तान में रामायण एक सर्वव्यापी महाकाव्य है और इसके तमाम अच्छे बुरे चरित्र भी समाज में किसी न किसी रूप में बने हुए हैं।

सन् 2020 का यह दशहरा इस लिहाज़ से यादगार और उल्लेखनीय रहेगा कि इस बार किसानों ने अपनी ज़िंदगी को प्रभावित करने वाले रावणों की शिनाख्त कर ली है। यह सही है या गलत है? कानूनी रूप से उचित है या अनुचित है? जैसे प्रश्नों के मायने इसलिए बहुत नहीं हैं क्योंकि ऐसा होता आया है। लोग जिसे अपने समय की सबसे बड़ी बुराई मानते हैं उसे रावण का स्वरूप दे देते हैं।

राजनीतिक दल भी अक्सर यह उपक्रम करते रहे हैं और धरने-प्रदर्शन के दौरान इस तरह पुतले जलाते आए हैं।

यूपीए सरकार के दौर में बीजेपी जब विपक्ष में थी तब उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पुतले अक्सर जलाए हैं। लेकिन आज़ाद भारत के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में शायद यह पहली दफ़ा देखने को मिला है जब सरकार की नीतियों से क्षुब्ध किसानों ने दशहरे पर रावण की जगह देश के प्रधानमंत्री का पुतला जलाया हो।

उम्मीद थी कि इस बार कुछ जगहों पर रावण को कोरोना वायरस के रूप में भी दिखाया जाएगा, संभव है कहीं ऐसा हुआ भी हो पर ऐसी कोई तस्वीर अभी तक आँखों से नहीं गुज़री है। धार्मिक उत्सव को समसामयिक बनाने की रचनात्मकता समाज में रही है जिसकी झलक हर साल दुर्गा पंडालों, गणेश पंडालों में और दशहरे में दिखलाई दे जाती है। पश्चिम बंगाल में इस बार दुर्गा पंडालों में प्रवासी मजदूरों की पीड़ा दिखाने की रचनात्मक कोशिश के रूप में हुई है। इसके राजनैतिक मायने भी ज़रूर होते हैं।

ऐसा ही एक दृश्य 1945 में यानी आज़ादी के आंदोलन के दौर का बार-बार ज़हन में आता है। जिसे उग्र हिन्दू विचारधारा के एक व्यक्ति नारायण आप्टे द्वारा रचा गया था और नाथूराम गोडसे द्वारा संपादित पत्रिका अग्रणी में प्रकाशित किया गया था।

 

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