डायबिटीज़ से होने वाली आंखों की ये 4 समस्याओं के बारें में, पढ़ें

दोस्‍तों आप जानतें हैं कि कोरोना महामारी से सारा विश्‍व जूझ रहा है लेकिन पूरी दुनिया में नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों के प्रति कम सावधानी बरती जा रही है या कहें कि इन्हें कम प्राथमिकता दी जा रही है। एनसीडी, डायबिटीज़ और क्रोनिक बीमारियों ने 77 मिलियन भारतीयों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। कोविड-19 शरीर के लगभग सभी हिस्से को प्रभावित करता है, लेकिन ज्यादातर लोग यह नहीं जानते हैं कि कोविड-19 के अलावा डायबिटीज़ से भी आंखों और ऑकुलर हेल्थ पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

कोविड-19 के पहले आधे मिलियन से ज्यादा लोगों का इलाज डायबिटिक रेटिनोपैथी, ग्लूकोमा, स्क्विंट और आरओपी आदि के लिए किया गया। जबकि, 2017-18 के दौरान मोतियाबिंद के 6.5 मिलियन मामले सामने आए। हालांकि, ये सभी मामले सिर्फ डायबिटीज़ की वजह से नहीं हुए थे। नेत्र रोग में डायबिटिक रेटिनोपैथी, डायबिटिक मैक्युलर एडिमा / इस्केमिया, मोतियाबिंद और ग्लूकोमा जैसी आंखों से जुड़ी बीमारियां अंडरलाइंग डायबिटीज़ से उत्पन्न हो सकती हैं और बढ़ भी सकती हैं।

इसलिए यह जरूरी है कि डायबिटीज़ के मरीज़ों को अपनी आंखों के खतरे को लेकर सावधान रहना चाहिए और इनकी हालत न बिगड़े इसके लिए आंखों की देखभाल की जानी चाहिए।

डायबिटीज़ किस तरह आंखों पर असर करती है?

पहले यह समझना ज़रूरी है कि डायबिटीज़ का मतलब क्या है। डायबिटीज़ मतलब आपके खून में ग्लूकोज़ की मात्रा कहीं ज़्यादा बढ़ना। इस कंडीशन को हायपरग्ल्य्समिया कहा जाता है क्योंकि इस कंडीशन में इंसुलिन नहीं होता है और अगर होता है तो काफी अंडर परफार्मिंग होता है। खून में ज़्यादा शुगर न सिर्फ आपकी आंखों के टिशू को ख़राब कर सकता है बल्कि आंखों में सूजन का भी कारण बनता है, जिससे आपको धुंधला दिखने लगता है। इस वजह से आपकी आंखों के ब्लड वेसेल्स को गंभीर नुकसान हो सकता है। इससे आपको आंखों से जुड़ी गंभीर समस्या हो सकती है।

डायबिटीज़ से होने वाली आंखों की समस्याएं

डायबिटिक रेटिनोपैथी

डायबिटीज़ की वजह से आंखों में डायबिटिक रेटिनोपैथी सबसे आम समस्या है। इस स्थिति में लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर ऊंचा रहता है। इसमें आंख के पीछे रेटिना तक फैली हुई ब्लड वेसेल्स को नुकसान पहुंचता है। जिससे आंख में ब्लड और तरल पदार्थ का रिसाव होता है, जो धुंधला दिखने का कारण बनता है। गौरतलब, है कि शुरुआती स्टेज में आंखों में नई ब्लड वेसेल्स नहीं बनती हैं, इसे गैर-प्रसारकारी डायबिटीज़ संबंधी रेटिनोपैथी कहा जाता है। हालांकि, जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है और कंडीशन बिगड़ती है, तो इस वजह से नॉन-प्रोलिफेरेटिव डायबिटिक रेटिनोपैथी हो जाती है। इसमें नई ब्लड वेसेल्स असामान्य रूप से रेटिनॉविच के अंदर बढ़ने लगती हैं। जिससे या तो बहुत खून बहता है या पूरी तरह से दिखना बंद हो जाता है। एक सर्वे के अनुसार भारत में डायबिटिक रेटिनोपैथी 16.9% है।

डायबिटिक मैक्युला इडिमा/इस्केमिया

मैक्युला न केवल रेटिना का सबसे संवेदनशील हिस्सा होता है, बल्कि यह उत्तरार्द्ध में एक फंक्शनल सेंटर होता है, जिसकी वजह से हमें पढ़ने, चेहरे को पहचानने और ड्राइव करने में मदद मिलती है लेकिन, असाधारण रूप से हाई ब्लड शुगर होने के कारण मैक्युला में सूजन हो जाती है। जिसे मैक्युला इडिमा कहा जाता है और इससे धीरे नज़र आना कम होता जाता है। उसी समय जब ब्लड वेसेल्स मैक्युला तक ब्लड पहुंचने से रोकती है, तो यह मैक्युलर इस्किमिया नामक की कंडीशन को उपन्न्त करती है जिससे दिखने में समस्या आती है।

डायबिटिक मोतियाबिंद

मोतियाबिंद एक ऐसी आंख की कंडीशन होती है, जो डायबिटीज से जुड़ी होती है, इससें डायबिटीज के मरीज में दिखना बंद हो जाता है। शुगर का हाई लेवल होने से आंख के लेंस में सूजन हो सकती है। इसके अलावा इससे लेंस में एंजाइम ग्लूकोज को सोर्बिटोल में बदल जाता है, जो लेंस पर जमा हो सकता है और इससे दिखना बंद हो सकता है। विशेष रूप से प्रीडायबिटिक कॉम्प्लीकेशन्स वाले लोगों में मोतियाबिंद होने की संभावना दोगुनी हो जाती है।

डायबिटीज और ग्लूकोमा

ग्लूकोमा कई तरह से हो सकता है, डायबिटीज आंख के ऑप्टिक नर्व के नुकसान से संबंधित प्रीकंडीशन होती है। सामान्य तौर पर ग्लूकोमा से पीड़ित होने की संभावना एक गैर डायबिटीज मरीज के मुकाबलें डायबिटीज वाले मरीज में दोगुना होता है। आमतौर पर ग्लूकोमा लेंस के आसपास तरल पदार्थ के अत्यधिक निर्माण के कारण होता है, जिससे आँखों की नस पर दबाव पड़ता है।

डायबटीज मरीजों में अनियंत्रित शुगर लेवल के कारण ब्लड वेसेल्स की असामान्य वृद्धि आंख से निकलने वाले प्राकृतिक जल को रोकती है जिसके परिणामस्वरूप नज़र कमजोर हो सकती है और यहां तक कि अंधापन भी हो सकता है।

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