भारत शर्मा
सेठ छज्जूमल की शव यात्रा बड़े जोर शोर से निकल रही थी, शव यात्रा क्या शोभा यात्रा कहना ज्यादा ठीक है। उम्र पूरी करने के बाद रुखसत हुए हैं, भरा पूरा परिवार है। पीछे चलती भीड़ नारे लगा रही थी, छज्जूमल के अरमानों को मंजिल तक पहुचाएंगे।
छज्जूमल पुराने स्वयं सेवक हैं, ये उस वक्त की बात है, जब स्वयं सेवक बताने पर राजनैतिक लाभ नहीं मिलता था, लिहाजा वे कांग्रेस में रहकर काम करते रहे, कांग्रेसी इसलिए थे, क्योंकि कालाबाजारी करने के लिए ये वक्त की मांग थी। सेठ जी वक्त की नब्ज को बेहतर पहचानते थे, अपने धंधे की शुरुआत राशन की दुकान से उन्होंने की थी, अब हर बड़े शहर में होटल है, कई फैक्ट्रियां हैं, नगर सेठ कहलाते हैं। आचरण के इतने साफ, कि पूरी जिंदगी रामराज लाने के अरमान पाले रहे, ये अलग बात है, राम मंदिर में चंदा चोरी करते पकड़ गए थे। पक्के कर्मयोगी थे, कहते थे भावुक तो मूर्ख लोग होते हैं, धर्म अलग बात है और कर्म अलग। बाल्मीकि ने जिंदगी भर डकैती डाली, पर उनसे बड़ा राम भक्त कोई है क्या।
मैंने अपने पास खड़े एक व्यक्ति से जानना चाहा, छ़ज्जूमल का अब कौन का अरमान है, जो पूरा होना है। उसने दार्शनिक अंदाज में राय दी, अरमान होते ही बड़े लोगों के हैं, जो अधूरे रह जाते हैं। कई बार किसी ऐसे व्यक्ति की अंतिम यात्रा में भी इस तरह के नारे सुनने को मिल जाते हैं, जिसने समाज के लिए बड़ा योगदान दिया हो, पर वो अरमान शमशान की आग में स्वाहा हो जाते हैं। रही बात गरीबों की, तो उनके क्या अरमान और क्या सपने। बालाघाट में जिन आदिवासी बच्चों की मौत हुई, उनके भी अरमान होंगे, कि ढ़ंग का डॉक्टर मिल जाता तो, जान बच जाती। नीट पेपर लीक होने के कारण जिन बच्चों ने आत्म हत्या की उनके अरमान होंगे, कि डॉक्टर बनकर इन आदिवासी बच्चों को बचाएंगे। अब इनके अरमानों की चिंता न समाज को है, न सरकार को। न पेपर लीक रुकेगा, न भुखमरी से बच्चों की मौत। दूसरे में रहस्योद्घाटन करते हुए बताया, कि सेठजी मंत्री बनना चाहते थे, कहते थे, पार्टी चंदा तो भर भरकर लेती है, पर टिकट देने के नाम पर आनाकानी करती है। सेठजी के बेटे उनके इसी अरमान को मंजिल तक पहुंचाने की बात कर रहे हैं। मैंने कहा, कि मुझे लगा उनका अरमान रामराज लाना था, एक साथी ने बताया, सेठ जी भी बापू की तरह देश में राम राज लाना चाहते थे, पर दोनों की सोच में बुनियादी फर्क था, बापू ग्राम स्वराज के सहारे राम राज लाना चाहते थे और सेठ जी सत्ता की कुर्सी के सहारे। वैसे वो हर 2 अक्टूबर को अपने घर पर राम धुन का गायन कराते थे, कहीं ऐसा न हो, कि लोग उन्हें गांधी विरोधी मानने लगें।
मेरे एक परिचित हैं, ब्राह्मण हैं, हिंदू राष्ट्र के अरमाने पाले हुए हैं, उनका बेटा अमेरिका में पढ़ता है। मैंने एक बार पूछा, अपने बेटे को गुरुकुल क्यों नहीं भेजा, वेदपाठी बन जाता, तो हिंदू राष्ट्र के काम आता। कहने लगे, मेरे अरमान अलग हैं और बेटे के अलग। उनका कहना था, राम रोटी नहीं देते। इस बात पर मेरी उनके खासी बहस हुई, मेरा तर्क था, आजकल राम सत्ता भी दे रहे हैं और रोटी भी, वो भी घी में डूबी हुई। देश की सत्ता हो, या राम मंदिर के कर्ताधर्ता, या फिर फाईव स्टार आश्रमों में बैठे साधू बाबा। असल संत तो आम आदमी है, जो एक वक्त ही खा पाता है।
हिंदू राष्ट्र का अरमान तो आज कल वे लोग भी पाले हुए हैं, जिन्हें कभी सवर्णों ने मंदिर की सीढ़ियां नहीं चढ़ने दिया। वे चाहते हैं, हिंदू राष्ट्र बने,पर अंबेडकर के संविधान के साथ। इन लोगों के अरमानों के देखते हुए मनु महाराज और बाबा साहेब दोनों की नींद उड़ी हुई है, दोनों एक साथ आने को तैयार नहीं है। मनु महाराज कहते हैं, मैं उसके साथ नहीं जाऊंगा, जिसने मनु स्मृति जलाई, भले ही हिंदू राष्ट्र न बने, अंबेडकर कहते हैं, मैं उस आदमी के साथ नहीं जाऊंगा, जिसके कारण मुझे हिंदू धर्म छोडकर बौद्ध बनना पड़ा। इन दोनों के झगड़े के कारण इस देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के अरमान अधूरा है, फैरी तौर पर कभी कभी कुछ दंगे जरुर हो जाते हैं।
अरमान नेताओं के भी होते हैं और जनता के भी। हर नेता का अरमान मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक का होता है, इसके लिए वो काल, खंड और परिस्थिति के अनुसार खुद को बदलने के लिए हमेशा तैयार रहता है। कल तक जिस नेता को टीवी चैनल की डिबेट में आरएसएस को गालियां देते सुनकर हम सबसे बड़ा सेक्युलर होने का खिताब देते हुए तालियां बजाते हैं, वही आज खाकी निक्कर में लाठी लिए नजर आ जाता है। यह उस नेता का नहीं, उसके अरमान का दोष है, जिसे वो मंजिल तक पहुंचाना चाहता है। इसी तरह जनता का अरमान होता है, कि उसे साफ सुथरा ईमानदार नेता मिले, पर वो किसी ईमानदार को वोट देना नहीं चाहती। मेरे एक मित्र हैं, एक दम जुझारु। जनता के मुद्दों पर लड़ने के लिए हमेशा तैयार, कई साल से विधायक बनने का अरमान पाले हुए हैं, पर जनता कहती है, आपका अरमान पूरा कर दिया, तो हमारी लड़ाई कौन लड़ेगा। मजेदार बात यह है, कि उन्हें उनकी जाति वाले भी चुनाव में वोट नहीं देते। जनता मानती है, ईमानदार को जिताया, तो वो भ्रष्ट हो जाएगा। इसी आशंका के कारण कोई ईमानदार चुनाव नहीं जीत पाता।
अरमान तो भगत सिंह के भी थे, शोषण मुक्त समाज बनाने के, उन अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने के नारे हर साल 23 मार्च को लगते हैं, फिर साल भर के लिए संदूक में बंद कर दिए जाते हैं। सेठजी जानते थे, समर्थकों के भरोसे सब छोड़ दिया, तो केवल बरसी पर ही याद किए जाएंगे। जिस तरह एक सेठ का अरमान और अधिक पैसा, उसके बाद पॉवर कमाना होता है, सेठजी का भी अरमान यही था, जिसे पूरा करने की सौगंध उनके परिजन खा रहे हैं। इसकी तैयारी सेठजी मरने से पहले कर चुके थे, एक बेटा संघ में है, दूसरा कांग्रेस में और तीसरा समाजवादी है। इसके बाद भी कोई आता है, तो उसके लिए चंदे का इंतजाम कर दिया गया है। सफल प्रबंधक जानता है, अरमान पूरा करने के लिए ठोस योजना जरुरी है।