पिंडदान

भारत शर्मा

सिंह साहब स्वर्गाश्रम वालों के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहे थे, बाबूजी का कुछ सामान तो आपके पास होगा। चश्मा मिल जाए, चश्मे का कवर या फिर पहनने वाली चप्पल, कोई कपड़ा। स्वर्गाश्रम की मैनेजर राधा बाई चिल्ला रही थीं, इतने साल तुम्हारे पिताजी यहां रहे, तब उनकी सुध नहीं ली, मरने पर भी नहीं आए, कोई फोन नम्बर, कोई पता तक नहीं छोड़ा, जो जरुरत पड़ने पर खबर कर देते। जब तक जिंदा थे, सुध नहीं ली, अब सामान मांग रहे हो, तुम जैसे लोगों के कारण ही हमारे देश में बुजुर्ग इतना कष्ट पाते हैं।

सिंह साहब, मतलब रविन्दर सिंह यूं तो शिक्षा विभाग में मामूली से क्लर्क हैं, पर अपनी राजनैतिक पकड़ के चलते हमेशा डेप्युटेशन पर मलाईदार विभागों में रहे हैं। वर्तमान में आबकारी विभाग में महत्वपूर्ण पद पर हैं। ऊपर वाले की कृपा से सरकार कोई भी रहे, उनका महत्व सभी समझते हैं। मौजूदा समय में महत्व उसी का है, जो खुद कमाए और दूसरों को कमाकर दे, दूसरे शब्दों में जिए और जीने का सामान जमा कर दे। कई मंत्रियों और अफसरों की तो रसोई तक उनकी पहुंच है। अब तक आप समझ ही गए होंगे, सिंह साहब की ऊपरी कमाई ठीक ठाक हैं। पक्के कर्मकांडी हैं, रोज दो घंटे तो पूजा में जाते है फिर रोज शाम बेनागा किसी न किसी मंदिर के दर्शन। राजधानी का शायद ही ऐसा कोई मंदिर होगा, जहां सिंह साहब नियमित दान न देते हों, साफ है, किसी भी बड़े मंदिर को कोई भी पुजारी ऐसा नहीं है, जो उन्हें न जानता हो। एक तरह से वीआईपी दर्शन का लाभ उन्हें हर मंदिर में मिलता है, कई अधिकारी उनकी इस पहुंच का लाभ लेते थे।

 बाबूजी की याद उन्हें आज अचानक यूं ही नहीं आई। बाबू जी, मतलब रविन्दर सिंह के पिता ठाकुर गजेन्दर सिंह लंबे समय तक ग्वालियर के वृद्ध आश्रम में रहे, बाद में वहीं उनका देहांत भी हो गया था। पिता की मौत की खबर रविन्दर सिंह का समय रहते मिल गई थी, चाहते तो अंतिम संस्कार में शामिल हो सकते थे, पर नहीं गए। बाबूजी को मुखाग्नि भी आश्रम के लोगों ने दी थी। अक्सर आदमी अपनी गल्तियों को छुपाने के लिए तर्क खोज लेता है, सिंह साहब उसमें माहिर थे, जब कभी आत्मग्लानि होती, तो मन को समझा लेते, मरने वाले को क्या पता, आग किसने लगाई। स्वर्ग, नरक कर्म के आधार पर मिलता है, अच्छे कर्म करोगे, तो स्वर्ग मिलेगा, इसका मुखाग्नि से क्या लेना देना, ये सब पंडितों के बनाए चोचले हैं। सिहं साहब की पत्नी प्रभा देवी भी उनके इस तर्क से सहमत थी।

पर अब मामला अपनी संतानों का था। सिंह साहब से दो बच्चे हैं, बड़ा बेटा धीरज और छोटी बेटी नीरू। बेटी बाबूजी की बड़ी लाड़ली रही, छोटी थी, तो उन्हीं के पास रहती थी। बाबूजी की आदत सुबह पांच बजे उठने की थी, जब तक घर के दूसरे लोग सोकर उठते थे, बाबूजी नहा धोकर पूजा करके तैयार हो जाते थे, फिर चाय बनाकर माताजी को जगाते थे। उनकी यह दिनचर्या तब तक चली, जब तक वे स्वस्थ रहे। नीरु ने जब चलना सीखा, तब से वो दादाजी से साथ ही रही, सुबह दादाजी की खांसी की आवाज सुनकर वह माता पिता को सोता छोड़कर चली जाती थी, उसके बाद उसका सारा काम करने का जिम्मा दादाजी का रहता। दादाजी भी उस पर जान छिड़कते थे, उनके रहते घर का कोई भी सदस्य नीरु से आधी बात भी नहीं कह सकता था। दादाजी के कारण ही वह जल्दी ही खाना भी सीख गई थी। स्कूल जाने से पहले दादी नियमित रुप से दो थाली लगाती थीं, एक दादाजी के लिए दूसरी नीरु के लिए। धीरे-धीरे वो बड़ी होती गई और दादाजी से दूर होती गई, पर दोनों का एक दूसरे से लगाव कम नहीं हुआ। उसके रहते कोई दादाजी से कुछ नहीं कह पाता था। सिंह साहब बाबूजी को आश्रम छोड़ने का दुस्साहस तब कर पाए, जब वो पढ़ने विदेश चली गई।

नीरू के वापस आने के बाद से सिंह साहब को उसकी शादी की चिंता लग गई है। अच्छा लड़का मिलता ही नहीं है, जो मिलता है, वो दहेज अधिक मांगता है, नीरू आजाद खयालों की लड़की है, उसने साफ कह दिया है, कि वो ऐसे किसी भी लड़के से शादी नहीं करेगी, जो दहेज लेता हो। प्रभा देवी अक्सर सिहं साहब को ताना मारती थी, और पढ़ा लो लड़की को विदेश। हमारी जाति में कम उमर् में ही लड़कियों के हाथ पीले हो जाते हैं, इसके साथ ही कोई नहीं बची। एक तो उमर् अधिक ऊपर से विदेश में पढ़ाई भी कर आई हैं। ऐसे में कौन ब्याहेगा इसे. ना इसकी उम्र का कोई मिलता है न इतना पढ़ लिखा। नीरु की शादी के साथ ही सिंह साहेब को धीरज की भी चिंता थी। सोचते थे, कुछ ढ़ंग का कर ले, तो किसी अच्छे घर में रिश्ता कर दें। अव्वल तो सरकारी नौकरी है ही नहीं, ऊपर से सामान्य वर्ग। अब अपनी राजनैतिक रसूख का इस्तेमाल कर कहीं लगा भी दें, तो संविदा की नौकरी भी कोई नौकरी होती है भला। कई बार धंधे के लिए पैसे भी दिए, पर लड़के में इतना शऊर ही नहीं है, हमेशा बाप के नाम की खाता रहा है, पैसे और डुबो दिए। कुछ कहो, तो मां सामने आकर खड़ी हो जाती है। एक दो बार सिंह साहब ने यह कोशिश भी की, कि सरकारी सप्लाई का काम दिला दें, दो रुपए के माल और तीस रुपए कमीशन देकर आराम से दस रुपए का बिल पास हो जाता है, पर किस्मत वहां भी नहीं चली। लगता है, परिवार को किसी की नजर लग गई है।

सिंह साहब भले ही कर्मकांडी थे, पर ज्योतिष पर उनका कतई भरोसा नहीं था, कहते थे, सब ठग विद्या है। आदमी अपनी किस्मत खुद लिखता है। खुद का उदाहरण देते थे, किस्मत में भले ही क्लर्क बनना लिखा था, पर अपनी मेहनत से आसमान छू रहे हैं, साथ के लोगों को ही ले लो, किस्मत पर भरोसा कर, जहां थे, वहीं रह गए। परिवार की परेशानी अच्छे अच्छे लोगों को ढहा देती है, सो पत्नी के कहने पर जन्म पत्री दिखाने को राजी हो गए। पंडित जी घर में घुसते ही समझ गए, कोई पुरखा नाराज है। कुंडली खोलते ही कहने लगे, भयानक काल सर्प योग है, जो राजयोग को भंग कर रहा है। परिवार के किसी बुजुर्ग की आत्मा भटक रही है, उसे मुक्ति नहीं मिल पाई है अभी तक। जब तक आत्मा तृप्त नहीं होती, कोई शुभ काम इस घर में नहीं हो सकेगा। अचानक सिंह साहब को बाबूजी की याद हो आई। उन्होंने पंडित जी को बताया, कि वे अपने पिता का अंतिम संस्कार नहीं कर पाए थे, ना ही पिंड दान किया, ना तेरहवीं। पंडित जी का सुझाव था, परिवार के सदस्य थे, अपने बच्चों से पुरखे ज्यादा दिन नाराज नहीं रहते। एक काम करिए, पितृ दोष दूर करने की विशेष पूरा होती है, जो उज्जैन या नासिक में होगी। पूजा के दौरान नए सिरे से अंतिम संस्कार किया जाएगा, फिर पिंडदान और आखिरी में ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देकर त्रयोदशी संस्कार भी कर दिया जाएगा, सारा काम एक दिन में हो जाएगा। पूजा के दौरान एक पत्तल में भोजन सामग्री निकालकर रख दी जाएगी, कौवा आएगा और उसे खा लेगा, तो समझ लो पूजा सफल और बाबूजी की नाराजगी भी खत्म। पंडित जी ने हिदायद दी थी, कि अंतिम संस्कार के लिए पिताजी का कोई न कोई सामान आवश्यक है, उसके बिना पूजा अधूरी रहेगी।

बाबूजी कड़क आदमी थे, कड़क मतलब, आवाज से, शरीर से और ईमान से भी। जब तक घर पर रहे, उनके रुटीन में कोई अंतर नहीं आया। सुबह सात बजे स्कूल जाना होता था पढ़ाने, इसलिए सुबह 5 बजे उठकर नहा धो लेते थे। हैड मास्टर भी रहे, पर कभी एक रुपए का हेरफेर नहीं किया। कहते थे, बच्चों में अच्छे संस्कार ही असल पूंजी है। परिवार के लोग कुछ कहते थे, हंसते हुए कई ऐसे लोगों के नाम गिना देते, जो पूरी जिंदगी रिश्वत खोरी करते रहे और बाद में उनकी बीमारी में उन्हें देखने वाला कोई नहीं था। इसीलिए जब रवीन्दर ने ऊपरी कमाई शुरु की, तो उस पर खासे नाराज होते थे। बाद में रवीन्दर बाबू शहर आ गए और दोनों के बीच बातचीत काफी कम हो गई। बाबूजी के रिटायरमेंट के बाद उनका एक ही प्रिय काम था, अखबार पढ़ना, एक ही खबर को कई कई बार पढ़ते थे। माताजी कहती थीं, अखबार चाट रहे हैं। रोज सुबह दोनों में इसी बात को लेकर झिकझिक होती थी, नाराज होकर बाबूजी घर छोड़कर चले जाते और चौराहे पर जाकर चाय की दुकान पर फिर अखबार पढ़ने लगते। उनकी इस आदत की जानकारी पूरे गांव को थी। बाबूजी और माताजी की अजब कहानी थी, रोज सुबह लड़ते थे, शाम को फिर एक साथ बैठकर पूरे गांव की पंचायत करते। माताजी को सुबह की चाय हमेशा बाबूजी ही बनाकर देते थे। माताजी भगवान पर अटूट भरोसा करने वाली और बाबूजी एक तरह के नास्तिक। माताजी जब भी उन्हें गीता पढ़ने को कहतीं, तो वे बोलते इसे पढ़कर मुझे नींद आ जाती है। राम के प्रति आस्था उनकी उसी रोज खत्म हो गई थी, जबसे राम मंदिर आंदोलन शुरु हुआ था। कुल मिलाकर घर में बने मंदिर की पूजा की जिम्मेदारी माताजी की थी। कभी कभार तीर्थस्थल जाते, पर भी उनकी कोशिश रहती, मंदिर न जाना पड़े, पर माताजी के जिद के कारण चले जाते।

छोटे बेटे की सड़क हादसे में हुई मौत ने मानो बाबूजी और माताजी को तोड़कर ही रख दिया था, वह उन्हीं के साथ गांव में रहकर खेती का काम देखता था। गनीमत थी, कि उसकी शादी नहीं हुई थी, वरना पराए घर की जवान लड़की को बोझ और उनके सर आ जाता। इस हादसे के बाद तो मानों दोनों के मुंह में जुबान ही नहीं बची। माता जी जो कहतीं, बाबूजी चुपचाप उसे सुन लेते। चाय की दुकान पर जाकर घंटों खामोश बैठे रहते, कभी कभार कोई पुराना छात्र मिल जाता, तो मुस्कुराकर उसका हाल पूछ लेते। फिर एक रोज माताजी भी चल बसीं। बाबूजी की तो मानो दुनिया ही खत्म हो गई, पचास साल से अधिक समय से दोनों एक साथ जो थे। बाबूजी गुमसुम हो गए, न अखबार पढ़ते थे, ना किसी के तर्क वितर्क में उलझते। गांव के लोगों को उनकी हालत देखी नहीं गई, तो रविंन्दर सिंह से कहा, बाबूजी को शहर ले जाओ, परिवार का साथ भी मिल जाएगा और अच्छा इलाज भी।

इस बात को लेकर सिंह साहब और उनकी पत्नी के बीच बड़ा विवाद हुआ। पत्नी का कहना था, शहर का खर्च वैसे ही पूरा नहीं होता, उन्हें ले आओगे, तो दवा दारु का खर्च और बढ़ जाएगा। सिंह साहब गांव वालों और रिश्तेदारों के दबाव में आकर उन्हें शहर ले आए। गांव में खुले समाज के बीच रहने वाले बाबूजी शहर में आकर बिल्कुल ही कैद हो गए। धीरे-धीरे उनकी तबियत और खराब होने लगी, उन्होंने लोगों को पहचानना भी बंद कर दिया। केवल बंटी नाम ही उन्हें याद था, जो सिंह साहब का घर का नाम था, इस नाम से उन्हें माताजी और बाबूजी की बुलाया करते थे। शहर आकर बाबूजी की तबियत इतनी बिगडी, कि वे टट्टी पेशाब भी कपड़ों में ही करने लगे। डाक्टर का कहना था, मांस पेशियों पर से दिमाग का कंट्रोल खत्म हो गया है।

इधर बाबूजी की तबियत खराब होती गई, ऊधर सिंह साहब के घर की शांति। प्रभा देवी ने घोषणा कर दी, कि इस हालत में वे बाबूजी की देखभाल नहीं कर पाएंगी, चाहो तो उनके लिए घर में 24 घंटे के नौकर लगा दो। अब नौकर का अपना संकट होता है, कई बार बिना बताए ही गायब हो जाते हैं, फिर इस महंगाई के दौर में कोई भी बीस पच्चीस हजार से कम नहीं लेगा। सिंह साहब चाहते, तो बाबूजी को पैंशन से यह काम हो सकता था, पर इसके लिए भी कोई राजी नहीं हुआ। एक दिन सिंह साहब ने बाबूजी को सुबह तैयार किया और कहा, चलो मथुरा-बृंदावन चलते हैं, रास्ते में ग्वालियर स्टेशन पर पानी लाने का बहाना बनाकर सिंह साहब सामान सहित ट्रेन से उतर गए। जब ट्रेन चलने लगी तो घबराकर बाबूजी भी उतर पड़े. बाबूजी पूरे प्लेटफार्म पर बंटी-बंटी चिल्लाते हुए भागते रहे, पर सिंह साहब उन्हें कहीं नजर नहीं आए। तीन दिन पर भूखे प्यासे स्टेशन पर भटकते रहे, फिर पुलिस वालों ने उन्हें स्वर्गाश्रम भेज दिया। आश्रम वालों ने भी कई दिनों तक उनके परिवार को खोजने की कोशिश की, पर न तो उनके पास कोई दस्तावेज था, न किसी का नाम पता उन्हें याद था। अलबत्ता सिंह साहब में इतनी मानवता जरुर थी, कि वे बाबूजी की पूरी खबर रखते थे। बाबूजी का जब देहांत हुआ, उस वक्त भी सिंह साहब को उसकी खबर थी।

आज अगर बच्चों के भविष्य का सवाल नहीं होता, तो शायद सिंह साहब कभी लौटकर स्वर्गाश्रम नहीं जाते। बहरहाल पूरे आश्रम में खोजने के बाद बाबूजी का एक जूता मिला। सिंह साहब उसे लेकर उज्जैन पहुंचे, पूरे विधि विधान से पूजा सम्पन्न कराई गई। सिंह साहब और प्रभा देवी जोड़े से बैठे, हाथ जोड़कर अंतिम विदाई दी। अंत में पंडित जी के कहे अनुसार कई प्रकार से व्यंजन लेकर एक पत्तल सजाई गई। उसे छत पर रखकर दोनों पति पत्नि कौवे का इंतजार करने लगे। कौवा आया, उसने पत्तल की तरफ देखा, कांव-कांव किया और उड़ गया। सिंह साहब की आंखें छलक आईं, उन्होंने पत्नी की तरफ देखकर रुंधे हुए गले से कहा, लगता है, बाबूजी अभी तक नाराज हैं।      

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